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About Us

The organization

माँ अनंता अभ्यूदय (माँ) सामाजिक सेवा समिति माण्डव एक गैर-लाभकारी स्वैच्छिक संगठन है। यह फर्मों और सोसायटी के पंजीकरण अधिनियम, 1973 (Reg. No.03/27/01/20750/18) के तहत पंजीकृत है, और ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर सतत विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया है।

माँ अनंता अभ्यूदय (माँ) सामाजिक सेवा समिति माण्डव वर्षों से ग्रामीण एवं वनवासी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के कार्यों में अपनी भागीदारी निभा रहा है । संस्था का मुख्य उद्देश्य वनवासी एवं गरीब लोगों को मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनाउपार्जन (लाइवलीहुड ),आध्यात्मिक धार्मिक, भारतीय संस्कृति,परम्परा से जोड़कर जीवन जीवन उपार्जन के संसाधन उपलब्ध करवाना है। हम यह कार्य पूर्ण समर्पण निष्ठा के साथ एकात्मकता से करने के लिए प्रतिबंध है ,हम यह कार्य पूर्ण नियोजित तरीकों से रोड मैप तैयार करके करते हैं। हम ग्रामीण वनवासी,गरीब तबके के लोगों को सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक रूप से सशक्त करने में समन्वय एवं पूर्ण नियोजन के साथ भागीदारी निभाते हैं।

हमारी दृष्टि

ग्रामीण एवं वनवासी (जनजाति) युवा बालिकाओं और महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से सुदृढ़ बनाना

अभियान

युवाओं की क्षमता वृद्धि, गुणवत्ता को ही जीवन पथ बनाये | सामाजिक जिम्मेदारी के साथ पर्यावरणीय नैतिक मूल्यों को ध्यान रखते हुए क्षमता वृद्धि, सुबुद्ध प्रभावी व्यतित्व एवं आध्यात्मिक विकास के लिए अथक परिश्रम करना है| वैदिक विज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का विकास एवं प्रसार|

दृढ़ विश्वास

समग्र विकास के साथ कर्तव्य, कठोर परिश्रम के साथ कठिनाइयों में संघर्ष, संकल्प कर सफलता का परचम लहराना|

लक्ष्य

श्रेष्ठ एवं गुनी युवा (व्यक्तित्व) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं आध्यात्मिक सोच विकसित करना|

संकल्पना और उदेश्य

  • समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और वित्तीय विकास के लिए काम करना।
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं संवर्धन|
  • विकास के सतत मॉडल विकसित करने
  • शिक्षा जागरूकता फैलाना।
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना ।
  • महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कराना ।
  • महिलाओं और बच्चों में नेतृत्व के गुणों को बढ़ावा देना।
  • शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में अभियानों, सेमिनारों, सम्मेलनों और कार्यशालाओं के माध्यम से जन जागरूकता पैदा करना।
  • आजीविका, शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक किफायती और टिकाऊ प्रणाली के विकास के लिए कार्यक्रम चलाना।

स्वास्थ्य

स्वस्थ समाज स्वस्थ राष्ट्र वनवासी क्षेत्र में युवा महिलाएं बालिकाएं एवं सभी जन यदि स्वस्थ होंगे तो निश्चित तौर पर उनकी कार्यशैली एवं जीवन शैली सशक्त होगी हमारी संस्था मुख्य रूप से बालिका और महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति अपने दायित्व का पूर्णरूपेण निरवहन करती है संस्था द्वारा समय-समय पर आसपास के क्षेत्र में महिला डॉक्टर द्वारा परीक्षण करने के साथ महिलाओं के पोषण आहार की निगरानी करना एवं उनके प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए जागरूक करने के लिए संस्था प्रतिबद्ध है ।

उच्च शिक्षा का अभियान

तमसो मा ज्योतिर्गमय‘‘ अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ, यह प्रार्थना भारतीय संस्कृति का मूल स्तम्भ है। प्रकाश में व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देता है, अंधकार में नहीं। यहां प्रकाश से तात्पर्य ज्ञान से है। ज्ञान से व्यक्ति का अज्ञानता रूपी अंधकार नष्ट होता है और उसका वर्तमान तथा भावी जीवन सुखमय बनता है। ज्ञान से उसकी सुप्त इन्द्रियां जागृत होती है। उसकी कार्य क्षमता बढ़ती है जो उसके जीवन को प्रगति पथ पर ले जाती है। व्यक्ति को ज्ञान का यह प्रकाश शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त होता है। व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक अनवरत् रूप से विभिन्न प्रकार की शिक्षा ग्रहण करता है अर्थात् यह जीवन भर सतत् रूप से चलने वाली प्रक्रिया है। शिक्षा का क्षेत्र विस्तृत होता है क्योंकि यह जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता है। महात्मा गांधी के अनुसार ‘‘शिक्षा वह दिव्य अस्त्र है जिससे व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास होता है और उसका व्यक्तित्व अत्यन्त सुदृढ़ हो जाता है।

जैव विविधता सरंक्षण

जैव विविधता किसी क्षेत्र में जीवन के विकास और पारिस्थितिकीय स्थायित्व को परिचायक होती है जीवन के विकास के क्रम में नई प्रजातियों का जन्म लेना और कमजोर प्रजातियों का विलुप्त होना निरंतर चलता रहता है। हमारे देश की नदियां, पहाड़ और जंगल जैव विविधता के समृद्ध भण्डार तो है ही वरन् कृषि क्षेत्र में भी जैव विविधता का विपुल भंडार है। हमारे धर्मग्रंथों में जैव विविधता और सरंक्षण का विशेष महत्व बताया है। और हमारे वेदों में इनकी महत्ता स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।

नर्मदा अंचल में अनेक प्रकार की अमुल्य, अद्भुत वनस्पति एवं जीवों की प्रजातियों का समृद्ध भंड़ार है। किन्तु मानव विकास कि दिनोंदिन प्रगति इनके लिए कष्टदायी होती जा रही है। मानव विकास तो आवश्यक है ही किन्तु वनस्पति एवं जीवों का अस्तित्व भी मानव के विकास को परिचायक है। अतः इन्हें बचायें रखने एवं समाज के विकास की निरंतरता को कायम रखने के लिए कुछ ऐसा रास्ता खोजना होगा कि दोनों ही एक दूसरे के पहलु बने और मनुष्य का विकास एंव जैव विविधता के सरंक्षण को एक नया आधार मिले।

जल संरक्षण और प्रबंधन

जीवन जल से ही उद्भूत है। जल के बिना जीवन संभव ही नहीं। इसलिए प्रकृति ने प्राणी को धरती पर अवतरित करने के पहले भरपूर जल संचित किया, स्त्रोत दिए, प्रवाह दिए ताकि प्राणी आवश्यकता अनुरूप जल को प्राप्त कर सके। किन्तु मनुष्य ने अपनी अदूरदर्शिता और अज्ञानता से उन सभी जल स्त्रोतों को प्रदूषित और अपवित्र कर लिया जिस जल से प्रकृति पल्लवित थी, पुष्पित थी, लेकिन चेतना प्राणी की प्रारंभिक विशेषता है। इसी चेतना शक्ति से मनुष्य ने अपनी गलती पहिचानी और उसके सुधार के प्रयास प्रारंभ कर दिए।

नदियों के संरक्षण और प्रबंधन

प्रकृति ने मानव के अस्तित्व को सतत बनाये रखने के लिये नाना प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों को जन्म दिया। इनमें प्रमुख हैं नदियाँ। नदियाँ सदियों से मानव सभ्यता और संस्कृति की साक्षी हैं तथा इनके किनारों पर भारत के ऋषि मुनियों ने कई धर्मग्रन्थों की रचना की जिनमें नदियों के संरक्षण ओर प्रबंधन के संबंध में वर्तमान स्थिति का सामना करने के लिये अपना दूरदर्शिता के आधार पर संकेत दिये। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के सदियों प्राचीन इतिहास की साक्षी नदियों ने कई सभ्यता और संस्कृति के सृजन और विध्वंस की अत्यंत करीब से देखा, जिसे मानव ने माँ, माई, मैया के रूप में पूजा, जो संसार में एक विशिष्ट भाव है। इस भाव में नदियों के संरक्षण और प्रबन्धन की भावनाएँ अन्तर्निहित हैं, परन्तु अब मानव ने जीवन की भागम-भाग और अपने अस्तित्व को प्रदर्शित करने के लिये, प्राकृतिक संसाधनों को संजोने एवं उनके संरक्षण की नजरिये में परिवर्तन आया है और जिसके कारण उनके उपभोग का मनस ही रह गया है। नदियों के जल का आय-व्यय का लेखा-जोखा तो दूर अपने निहित स्वार्थ के कारण नदियों के जल स्वास्थ्य को धीरे धीरे क्षीण करता जा रहा है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह अपने अस्तित्व को भी चुनौति दे रहा है। भारत की पवित्र नदियों में सरस्वती जहाँ एक ओर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, वहीं गंगा, जमुना और ब्रह्मपुत्र अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत् हैं। मानव नदियों के उपभोग के लिये तो सदैव तत्पर है, लेकिन उसके जल के लेखा जोखा, उसके स्वास्थ्य, संरक्षण, प्रबन्धन और गुणवत्ता व मात्रा के बारे में तनिक भी विचार न के बराबर करता है।

नदी के बिना मानव जीवन व्यर्थ है। नदी का अपना अर्थशास्त्र है, उनका अपना सुर ताल, संगीत है, अपना रंग है, अपना इतिहास और समाज है। कई संस्कृति सभ्यता की जननी व लोक नृत्य, कला, परम्पराओं एवं उत्सवों की जन्मदात्री है, नदी के अलग अलग पक्षों पर कार्य करने के लिए संस्था प्रतिबद्ध है ।

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